अजय बोकिल
हिंदी फिल्मों में गुजरे जमाने के एक खूबसूरत, खयालों में खोए से और देशभक्ति को अपनी पिक्चरों की केन्द्रीय थीम बनाकर देश को एक अलग तरह का संदेश देने वाले हीरो मनोज कुमार का हिंदी फिल्म जगत को क्या अवदान है? देशभक्ति की उनकी परिभाषा, सेल्युलाइड पर उसके चित्रण को भारत की बदलती राजनीतिक, सामाजिक चेतना के सदंर्भ में मनोज कुमार की भूमिका को हम किस रूप में याद करें? यह सवाल 87 वें साल में उनके निधन के बाद ज्यादा मौजूं हो गए हैं। समग्रता में देखें तो मनोज कुमार ने फिल्मों में अपनी आदर्शवादी, समावेशी देशभक्ति व राष्ट्रप्रेम के जरिए भविष्य में एक केन्द्रीय राजनीतिक विचार में तब्दील होने वाले प्रखर और काफी हद उग्र राष्ट्रवाद की शुरूआती जमीन तैयार की। मनोज कुमार कितने महान और वर्सटाइल अभिनेता थे, इस पर प्रश्नचिन्ह हैं, लेकिन वो एक निष्णात, डायरेक्टर, निर्माता संपादक और संवाद लेखक नि:संदेह थे। मनोज कुमार ने देश की स्वतंत्रता के एक दशक बाद नैतिक मूल्यों का आदर्श कायम रखते हुए देश के लिए जीने-मरने का ऐसा संदेश दिया, जो उस जमाने में हावी समाजवादी सोच और धर्मनिरपेक्ष आग्रहों से थोड़ा अलग हटकर था। इस अर्थ में मनोज कुमार को निर्मल देशभक्ति और प्रखर राष्ट्रवाद के िमलन बिंदु पर खड़ा कलाकार कहा जा सकता है। जो रोमांस में भी राष्ट्रीय मूल्यों को सहेजता है और जो राष्ट्रीय मूल्यों में रोमांस को जीता है। कुछ लोग मनोज कुमार की देशभक्ति को अति भावुकता से लबरेज और किसी हद तक अवास्तविकता से भरा मानते हैं। बावजूद इसके यह सचाई है कि मनोज कुमार ने यह फार्मूला व्यावसाियक तौर पर हिंदी िफल्मों में सफलता से अप्लाय किया और अपनी एक अलग छवि तैयार की।
यूं मनोज कुमार ने अपना फिल्मी कॅरियर उनकी पहली फिल्म ‘कांच की गुडि़या’(1961) से शुरू किया। लेकिन उस फिल्म के चाकलेटी चेहरे वाले हीरो मनोज कुमार का कोई खास नोटिस नहीं लिया गया। याद रहे कि मनोज कुमार का फिल्म इंडस्ट्री में आगमन उस जमाने में हुआ, जब एक तरफ देवदास तो दूसरी तरफ प्ले ब्वाॅय या फिर समाजवादी विचार से प्रेरित फिल्मी नायकों का जोर था। खुद मनोज कुमार िजनका असली नाम हरेकृष्ण गोस्वामी था, दिलीप कुमार के प्रशंसक थे। और िदलीप साहब की एक पुरानी फिल्म ‘शबनम’ में उनके किरदार ‘मनोज कुमार’ से प्रभावित होकर अपना फिल्मी नाम भी मनोज कुमार रख लिया था। फिल्मो में शुरूआती चार साल मनोज कुमार के संघर्ष के थे। हालांकि आंखें बंद कर डायलाॅग बोलने की उनकी अदा जरूर नोटिस की गई थी। 1964 में आई राज खोसला की यादगार फिल्म ‘वह कौन थी’ में मनोज बतौर हीरो नमूदार हुए, लेकिन वह फिल्म चली हीरोइन साधना के अभिनय और मदन मोहन के अमर संगीत के कारण। आज भी इस फिल्म के लिए लताजी द्वारा गाया ‘लग जा गले’ लता दीदी के टाॅप टेन सांग में शामिल करना ही पड़ता है।
लेकिन मनोज कुमार की िफल्मी कामयाबी और हिंदी फिल्म उद्योग में देशभक्ति को सफल व्यावसायिक फार्मूला बनाने की कहानी शहीद भगत सिंह पर बनी फिल्म ‘शहीद’ से शुरू होती है। इस फिल्म का संगीत आज भी लाजवाब है। इसी फिल्म को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मनोज कुमार को देशभक्ति और उनके अमर नारे ‘ जय जवान, जय किसान’ पर केन्द्रित एक फिल्म बनाने का सुझाव दिया। मनोज कुमार ने उस पर पूरी ईमानदारी से अमल किया और फिल्म ‘उपकार’ बनाई। मूलत: ये एक प्रचार फिल्म ही थी, लेकिन इसने रचनात्मकता, संवेदनशीलता, मैसेजिंग और बाॅक्स आफिस पर कामयाबी का नया इतिहास रचा। इसीलिए देश में राजनीतिक एजेंडों पर जितनी भी फिल्में बनी हैं, उनमें ‘उपकार’ का मयार सबसे अलग और शाश्वत है। मनोज कुमार ने इसे दिल से बनाया था। यानी यह प्रचार फिल्म होकर भी देशप्रेम का सार्थक संदेश देने वाली अमर और आइकाॅनिक फिल्म बन गई। शानदार पटकथा, कहानी, अभिनय, संवाद, पात्रों की संरचना, गीत और संगीत ने भी इस फिल्म को हिंदी की श्रेष्ठ फिल्मों में स्थापित कर िदया। इस फिल्म के निर्माण के दौरान हुए भारत-पाक युद्ध के दौरान उभरे राष्ट्रप्रेम , युद्ध के कुछ समय बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की असमय और रहस्यमय मौत ने इस फिल्म की प्रासंगिकता को और बढ़ा दिया। इस फिल्म में महेन्द्र कपूर द्वारा गाए देशभक्ति गीत ‘मेरे देश की धरती’ ने हमारे राष्ट्रीय पर्वों के थीम सांग की जगह ले ली और खुद महेन्द्र कपूर देशभक्ति गीतों के आइकन और मनोज कुमार ‘भारत कुमार’ की ऐसी छवि में ऐसे ढल गए कि जिसका लाभांश उन्हें 1981 तक मिलता रहा।
हालांकि मनोज कुमार ने ‘उपकार’ के बाद ‘पूरब पश्चिम’, ‘रोटी-कपड़ा-मकान’, ‘क्रांित’ जैसी देशभक्ति पूर्ण और बाॅक्स आॅफिस पर हिट फिल्में बनाईं, लेकिन ‘उपकार’ जैसा क्लासिक शाहकार वो नहीं बन सकीं।
इस दृष्टि से 1965 से 1981 का वह दौर, जो दो भारत-पाक युद्धों, समाजवादी-सेक्युलर और राष्ट्रवादी विचारों के बीच गहराते संघर्ष, आदर्शवाद और व्यवहारवाद में बढ़ते टकराव, 1971 के युद्ध में भारत की निर्णायक जीत के बाद आपातकाल में लोकतंत्र का दमन, गैर कांग्रेसी विचारों का असफल एकीकरण, नई राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक चेतना की दरकार एवं आजादी के बाद देखे और दिखाए गए सपनो के मोहभंग के बीच मनोज कुमार का फिल्मों में देशप्रेम के गुण गाते रहने का आग्रह शुरू में बहुत प्रेरक महसूस हुआ, लेकिन बाद में वह केवल फिल्मो को हिट बनाने वाले फार्मूले में तब्दील हो गया। खासकर देश में बढ़ती बेचैनी, एंग्री यंगमैन बनती जा रही पीढ़ी को यह फार्मूला अप्रासंगिक महसूस होने लगा। उदार, सौम्य और सर्व समावेशी देशप्रेम धीरे- धीरे उग्र राष्ट्रवाद में बदलने लगा। सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों में देश में ‘सर्व धर्म समभाव’ की उदात्त चेतना की जड़े हिलने लगी थी। ऐसे में मनोज कुमार का ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ का आह्वान भी रंग खोने लगा था। अस्सी के दशक में बहुसंख्यक हिंदुअों की धार्मिक चेतना उग्र राष्ट्रवाद के आवरण में नई हिलोरे लेने लगी, तब तक मनोज कुमार स्टाइल की देशभक्ति असर फीका पड़ गया था। बावजूद इसके ‘मनोज कुमार उर्फ ‘भारत कुमार’ चरित्र के दो प्रातिनिधिक गीत ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती’ और भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं..’ भविष्य में आर्थिक और सैनिक ताकत वाले भारत की पूर्व पीठिका तैयार कर चुके थे। वैसे ‘देशभक्ति फार्मूले’ से इतर भी मनोज कुमार ने कई फिल्मो में रोमांटिक हीरो’ का िजया, लेकिन इस रोल में वो किसी भी पीढ़ी का वैसा आइकन नहीं बन सके, जैसे दिलीप कुमार, देवानंद, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन या शाहरूख खान रहे हैं। अपने सफल फिल्मी जीवन के आखिरी सालो में उन्होंने राजनीति में कदम रखकर अगर ‘भारतीय जनता पार्टी’ की सदस्यता ली तो यह मनोज कुमार का स्वाभाविक चयन ही था। यह भी संयोग है कि भारतीय फिल्म जगत का सर्वाधिक प्रतिष्ठित दादा साहब फालके पुरस्कार भी मनोज कुमार को 2015 में मोदी सरकार सत्ता में आने के बाद मिला। हालांकि 1992 में नरसिंहराव सरकार के समय उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि जिस जमीन पर आज ‘इंडिया फर्स्ट’ वाली सोच का महल खड़ा है, फिल्म जगत में उसकी नींव मनोज कुमार ने ही रखी थी।