राजेश बादल
डोनाल्ड ट्रंप अब अमेरिका ही नहीं शेष संसार के लिए भी भारी पड़ने लगे हैं। भले ही वे विश्व के एक आधुनिक लोकतंत्र के मुखिया हों लेकिन वे इस विचारधारा की नुमाइंदगी करते नहीं दिखाई देते। अपने दूसरे कार्यकाल में वे जिस रूप में प्रकट हुए हैं,वह यक़ीनन लोकतंत्र का एक विकृत संस्करण है ।उनका यह रूप विकासशील और विकसित मुल्क़ों को रास नहीं आ रहा है।लोकतंत्र कभी भी अधिनायकवादी सोच को संरक्षण नहीं देता और न ही वह सबसे योग्य और सक्षम व्यक्ति को यह हक़ देता है कि वह धमकी देकर या रौद्र रूप दिखाकर छोटे - बड़े राष्ट्रों को अपने सामने झुकाने के लिए दबाव डाले। मगर , डोनाल्ड ट्रंप यह कर रहे हैं। वे अमेरिका की एक सदी में कमाई गई लोकतांत्रिक यश पूँजी को गँवाने के रास्ते पर चल पड़े हैं। पद सँभालने के बाद उनके नित नए विरोधाभासी बयान अखिल विश्व को हैरान और भ्रमित कर रहे हैं।
अगर उनके हालिया बयानों पर ग़ौर करें तो पाते हैं कि कभी वे रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ खड़े हुए हैं। ऐसा लगता है कि पुतिन के साथ उनका जन्म जन्मांतर का रिश्ता है और वे चौबीस घंटे में रूस -यूक्रेन जंग ख़त्म कराने में सक्षम हैं। लेकिन चंद रोज़ बाद ही वे पुतिन को धमकाने की मुद्रा में आ जाते हैं।वे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को दबाव में लेकर दुर्लभ यूक्रेनी खनिज संपदा पर अमेरिकी गिद्ध दृष्टि डालते हैं,उनसे समझौता कराते हैं और जैसे ही वह समझौते की समीक्षा की बात करते हैं तो उन्हें आतंकित करने का प्रयास करते हैं। चीन पर उनकी स्थायी वक्र दृष्टि है तो हिन्दुस्तान भी उनके स्वार्थ संसार से बाहर नहीं है।भारत के लिए वे कभी नरमी बरतते हैं तो कभी टैरिफ के बहाने ख़ौफ़ में डालने के बयान देते हैं।ईरान तो उनकी स्थायी शत्रु सूची में है।वे दशकों से अमेरिका के सहयोगी - पिछलग्गू रहे कनाडा,मेक्सिको और यूरोपीय देशों तक को नहीं छोड़ते। समझना मुश्किल है कि पूँजीपति से राजनेता बना यह महत्वपूर्ण व्यक्ति आखिर चाहता क्या है ? अमेरिका फर्स्ट की नीति समझ में आती है और अपने राष्ट्र का हित संरक्षण समझ में आता है ,पर उनकी शैली समूचे विश्व को नाराज़ करके अमेरिका फर्स्ट की नीति कैसे पल्ल्वित पुष्पित करेगी - यह समझ से परे है।
दरअसल डोनाल्ड ट्रंप की सारी नीतियाँ पूँजी केंद्रित, विस्तारवादी और धमकी केंद्रित हैं।कभी वे कनाडा को अपना 51 वाँ राज्य बन जाने की सलाह देते हैं और वहाँ के प्रधानमंत्री को अमेरिकी गवर्नर के रूप में देखना चाहते हैं तो कभी वे पनामा नहर को फिर हथियाना चाहते हैं।ट्रंप कहते हैं कि अमेरिका की बेवकूफ़ी के चलते पच्चीस बरस पहले इस नहर का नियंत्रण पनामा को दे दिया गया था।इस फ़ैसले का चीन ने सर्वाधिक लाभ उठाया और अपना कारोबार बढ़ाया।अब ट्रंप हाथ मल रहे हैं।इसीलिए वे नहर का क़ब्ज़ा वापस चाहते हैं। पनामा के राष्ट्रपति ने उनको करारा उत्तर दिया है।चूँकि पनामा को अब चीन का संरक्षण है।इस कारण यह आसान नहीं है।डोनाल्ड ट्रंप बांग्लादेश के सेंट मार्टिन द्वीप को भी चाहते हैं ताकि अमेरिका चीन की निगरानी कर सके। पाकिस्तान में अपना फौजी अड्डा बनाने की उसकी पुरानी चाह है ,लेकिन अब वह चीन के प्रभाव में है। अमेरिका का यह सपना पूरा नहीं होगा ,पर अब दूसरे कार्यकाल में ट्रंप चाहते हैं कि एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान में अपना अड्डा बनाएँ ,जिससे रूस और चीन ,दोनों पर बारीक़ नज़र रखी जा सके। विडंबना यह है कि ट्रंप अमेरिका के स्वार्थों का संरक्षण एक उद्योगपति या महत्वाकांक्षी पूँजीपति की तरह करना चाहते हैं। उनका यह दृष्टिकोण लोकतान्त्रिक धारा के साथ नहीं बहता बल्कि साम, दाम ,दंड और भेद का उपयोग करना चाहता है। इसके दूरगामी परिणाम बड़े ख़तरनाक और भयावह हो सकते हैं।रविवार को ट्रंप ईरान को सीधी सीधी चेतावनी दे बैठे। उन्होंने एक समाचार एजेंसी से बातचीत में यह धमकी दी। उन्होंने कहा , " यदि ईरान अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम पर समझौता नहीं करता तो अमेरिका के हमले का सामना करने के लिए तैयार रहे। अगर ईरान ऐसा नहीं करता तो बमबारी होगी। यह ऐसी बमबारी होगी ,जैसी उन्होंने पहले कभी नहीं देखी होगी। उनके पास एक मौका है। अगर वे नहीं मानें तो उन पर चार साल पहले की तरह सेकेंडरी टैरिफ लगा दूँगा। ट्रंप ने अपनी धमकी को दिखाते हुए डिएगोगार्सिया में अपने सबसे घातक बी -2 स्पिरिट बॉम्बर विमान भी तैनात कर दिए हैं। यहाँ से ईरान की राजधानी तेहरान केवल 5267 किलोमीटर है।
अफ़सोस की बात यह कि ट्रंप अपने इस विकृत सोच को छिपाना नहीं चाहते। वे अपनी किताब आर्ट ऑफ़ द डील में लिखते हैं ," सौदा करने का मेरा तरीका काफी सरल और सीधा है।मैं बहुत ऊँचा लक्ष्य रखता हूँ। फिर मैं जो चाहता हूं, उसे पाने के लिए जी जान से कोशिश करता रहता हूं। कभी-कभी मैं अपनी इच्छा से कम पर समझौता कर लेता हूं, लेकिन ज्यादातर प्रसंग ऐसे होते हैं ,जिनमें मैं फिर वही हासिल कर लेता हूँ , जो मैं चाहता हूँ। यह ट्रंप का घनघोर व्यावसायिक नज़रिया है। इसके दूरगामी नतीजे संभवतया अमेरिका के लिए अच्छे नहीं होंगे।
अब आते हैं डोनाल्ड ट्रंप के टेरिफ आक्रमण पर।जब डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ लगाने की चेतावनियाँ अलग अलग देशों को देते हैं तो वे भूल जाते हैं कि अमेरिका असल में आज जिस मज़बूत स्थिति में है ,उसके पीछे अकेले वे नहीं हैं। एक लोकतंत्र के रूप में स्थापित होने के बाद अमेरिका को शिल्पी की तरह गढ़ने का काम अब्राहम लिंकन ,जॉर्ज वाशिंगटन ,फ्रेंक्लिन डी रूज़वेल्ट ,थियोडोर रूजवेल्ट से लेकर बराक़ ओबामा ने जो योगदान दिया है ,उसी के बूते ट्रंप डींग हाँक रहे हैं। मान्य सिद्धांत है कि बड़ा और मज़बूत देश हमेशा छोटे मुल्क़ को मदद करता रहा है। अमेरिका ने यही किया है। उसने टैरिफ को कभी सोने की तराजू पर नहीं तौला।वह अपने निर्यात शुल्क को कमज़ोर देशों के लिए उदार रखता रहा है। इसका उसे लाभ मिला है। अब ट्रंप उलटी गंगा बहाना चाहते हैं। वे बराबरी का सौदा करेंगे तो छोटे से छोटा राष्ट्र भी यही करेगा। नतीजतन अमेरिका इतिहास में सबसे ख़राब स्थिति का सामना करेगा।